संबंधो के दोराहो पर कई बार दायित्वों व व्यक्ति के बीच चुनाव जटिल हो जाता है , तराजुओ कि इन दो पडलो कि प्रासंगिकता टटोलने का प्रयास है यह ...........प्रतिक्रियाओ कि अभिलाषा में प्रखर
चुनाव
मुट्ठी भिचू या खोल दूँ अधर में हूँ तुम ही बताओ मै क्या करू ?
कभी तो दिल करता है कि तुम्हे आपनी बाहों में समेट कर भूल जाऊ सबको
तो कभी लगता है कि ''मंजिले और भी हैं''
दायित्वों के इस भाव सागर में तुम नाव नहीं बन सकती मेरी
,हाँ
एक द्वीप जरुर हो सकती हो
जिसके आगोश में कुछ आराम कर सकता हूँ मैं,
पर सागर को तो तैर कर ही पार करना है मुझे,,,
,,,तभी तो कहता हूँ मुझसे उम्मीदें न बंधो
कोई आशा न करो ........
मेरे दायित्व तो जीवन है मेरा.....
क्या मुर्दे कि इबादत कर सकती हो तुम ?
इतना जरुर बता देना
तुम्हारा जवाब मेरे फैसलों पर कोई असर तो नहीं डालेगा
पर मुझे इतना जरुर पता लग जाएगा कि
कुछ देर क लिए ही सही मुझे रुकना है
उस द्वीप पर या नहीं .......................
Omit dada. Hello, how are you? .I am chhutki.
ReplyDeletePlease give me your email-id dada.
my email.id is (mahimamishra1998@gmail.com)
Poem comment :-Nice poems & good thinking lage raho dada paisa milega ok bbye.