धीरे -धीरे
खुलती है जब कोपल कि आँखे
प्रतीत होता है माध्यम
यह प्रकाश है
घटनाओ को देखने के लिए
अनुभव होता है कुछ बल घटनाओ को परिभाषित करने के लिए
अपने शब्दों में ,
परन्तु लग जाते है २५-३० वर्ष या अधिक बल ,प्रकाश को स्पष्ट करने में
कुछ अपनों को आवश्यकता है हमारी ,जीवन के अंतिम मोड़ पर
पर अब कोपल व्यस्त है जीवन गढ़ने में
वह प्रयासरत है खिलने में , सुन्दर दिखने में
कोपल देख नहीं पता न ही जाँच पता है
कि फूल बनकर भी उसने क्या खोया
धीरे धीरे बीत जाती है सदियाँ
हाँथ बधी घडी में
डाकिया आता है लता है ख़त
जिसमे है सफ़ेद बाल और कुछ झुर्रियां
वह समझ जाता है
कि धीरे धीरे वह आदि, मध्य,अंत कि अवधारणायें पूरी करने जा रहा है
उस फूल को जरुरत है अपने कोपलो कि
उनके साथ कि
पर वह वस्त है उसकी तरह
जीवन गढ़ने में
नए नए धागे बुनने में
धीरे धीरे वह बंधता है उम्मीद ,अकाल कथा कि
अंतिम राह पर ,शांत होते है प्रकाश ,बल
व सभी बंधन
अब यहाँ साथ है
अपनों का
सहारा भी है
कंधो व पैरो पर एक साथ
परन्तु क्या यह ही अपने है
नहीं ,नहीं
आता है विश्वाश
धीरे धीरे....................
प्रखर मिश्र ''विहान''
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