Monday, August 2, 2010

प्रधानता किसकी ??? प्रेम या दायित्व

संबंधो के दोराहो पर कई बार दायित्वों व व्यक्ति के बीच चुनाव जटिल हो जाता है , तराजुओ कि इन दो पडलो कि प्रासंगिकता टटोलने का प्रयास है यह ...........प्रतिक्रियाओ कि अभिलाषा में प्रखर

चुनाव

मुट्ठी भिचू या खोल दूँ अधर में हूँ तुम ही बताओ मै क्या करू ?
कभी तो दिल करता है कि तुम्हे आपनी बाहों में समेट कर भूल जाऊ सबको
तो कभी लगता है कि ''मंजिले और भी हैं''
दायित्वों के इस भाव सागर में तुम नाव नहीं बन सकती मेरी
,हाँ
एक द्वीप जरुर हो सकती हो
जिसके आगोश में कुछ आराम कर सकता हूँ मैं,
पर सागर को तो तैर कर ही पार करना है मुझे,,,
,,,तभी तो कहता हूँ मुझसे उम्मीदें न बंधो
कोई आशा न करो ........
मेरे दायित्व तो जीवन है मेरा.....
क्या मुर्दे कि इबादत कर सकती हो तुम ?
इतना जरुर बता देना
तुम्हारा जवाब मेरे फैसलों पर कोई असर तो नहीं डालेगा
पर मुझे इतना जरुर पता लग जाएगा कि
कुछ देर क लिए ही सही मुझे रुकना है
उस द्वीप पर या नहीं .......................

जीवन एक कटु चक्र

धीरे -धीरे 
खुलती है जब कोपल कि आँखे 
प्रतीत होता है माध्यम 
यह प्रकाश है 
घटनाओ को देखने के लिए 
अनुभव होता है कुछ बल घटनाओ को परिभाषित करने के लिए
 अपने शब्दों में ,
परन्तु लग जाते है २५-३० वर्ष या अधिक बल ,प्रकाश को स्पष्ट करने में 
कुछ अपनों को आवश्यकता है हमारी ,जीवन के अंतिम मोड़ पर 
 पर अब  कोपल  व्यस्त है जीवन गढ़ने में 
वह  प्रयासरत है खिलने में , सुन्दर  दिखने में
कोपल देख नहीं पता न ही जाँच पता है
 कि फूल बनकर भी उसने क्या खोया 
धीरे धीरे बीत जाती है सदियाँ 
हाँथ बधी घडी में 
डाकिया आता है लता है ख़त 
जिसमे है सफ़ेद बाल और कुछ झुर्रियां
वह समझ जाता है 
कि धीरे धीरे वह आदि, मध्य,अंत कि अवधारणायें पूरी करने जा रहा है 
उस फूल को जरुरत है अपने कोपलो कि 
उनके साथ कि 
पर वह  वस्त है उसकी  तरह 
जीवन गढ़ने में 
नए नए धागे बुनने में
धीरे धीरे वह बंधता है उम्मीद ,अकाल कथा कि   
अंतिम राह पर ,शांत होते है प्रकाश ,बल 
व सभी बंधन
अब  यहाँ साथ है  
अपनों का 
सहारा भी है 
कंधो व पैरो पर एक साथ 
परन्तु क्या यह ही अपने है 
नहीं ,नहीं 
आता है विश्वाश  
धीरे धीरे....................
                                प्रखर मिश्र ''विहान''